क्या है मोहन जोदड़ो?- Mohenjo Daro Information In Hindi

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मोहन जोदड़ो- Mohenjo Daro Information In Hindi

मुअनजो-दड़ो का सिन्धी भाषा में अर्थ है " मुर्दों का टीला, यह दुनिया का सबसे पुराना शहर माना जाता है। यह सिंघु घाटी सभ्यता का सबसे परिपक्व शहर है। इतने शाल पहले बने इस सहर को इतने सही तरीके से बनाया गया है की आप अनुमान बही नही लगा सकते माना जाता है कि यह शहर 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था। यहाँ पर पायी गयी हर एक चिज को देखने के बाद यही लगता है की आज के टाइम में और उस टाइम में कुछ ज्यादा अंतर नजर नहीं आता है , उस टाइम के लोग भी उतने ही विकसित थे जितने की आज हैमोहनजोदड़ो  Mohenjo-daro विश्व की चार प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में सबसे ज्यादा विशाल है जो 12 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में वर्तमान पाकिस्तान , अफगानिस्तान और भारत तक फैला हुआ था |

क्या है मोहन जोदड़ो?- Mohenjo Daro Information In Hindi

कुछ बातें आपको जान के हैरानी होगी

 हड़प्पा धर्म के स्वरूपों के विषय में प्राप्त जानकारी के अनुसार उसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न ज्ञात होती हैं- 
  •  मोहनजोदड़ो  Mohenjo-daro विश्व की चार प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में सबसे ज्यादा विशाल है जो 12 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में वर्तमान पाकिस्तान , अफगानिस्तान और भारत तक फैला हुआ था |
  •  मोहनजोदड़ो Mohenjo-daro को विश्व का सबसे ज्यादा सुनियोजित शहर माना जाता है जिसमे वर्तमान नगर निर्माण के कई ऐसे उदाहरण मिलते है जिन्हें हम आज भी उपयोग करते है |
  • मोहनजोदड़ो के सभ्यता में लोगो ने कीमती पत्थरों से आभूषण बनाने की कला को सीख लिया था जिसके परिणामस्वरूप मोहनजोदड़ो की खुदाई में कई  पत्थर  निर्मित आभुषनो के अवशेष मिले है |
  • इस 5000 साल पुरानी सभ्यता की आबादी शायद 40000 से भी ज्यादा थी |
  • मोहनजोदड़ो की सभ्यता के दौरान बड़े बड़े अन्न भंडार मिले है जिससे पता चलता है उस दौर में उन्होंने अन्न को सहेजकर साल भर इस्तेमाल करने का तरीका सीख लिया था |
  •  इस सभ्यता में प्रकृति से चलकर देवत्व तक की यात्रा धर्म ने तय की थी। एक ओर हम वृक्ष पूजा देखते हैं तो दूसरी ओर पशुपति शिव की मूर्ति तथा व्यापक देवी पूजा।

  •  धर्म में आध्यात्म और कर्मकाण्ड दोनों ही यहां साथ उभरे हैं। यहाँ से प्राप्त धड़ विहीन ध्यानावसित संन्यासी की आकृति एक ओर आध्यात्मिक चेतना को उजागर करती है तो दूसरी ओर देवी के सम्मुख पशुबलि के लिए बँधे बकरे की आकृति जो ठिकड़े पर अंकित है कर्मकाण्ड की गहनतम भावना का घोतक है।

  •  प्रतीकों को धर्म में स्थान प्राप्त हो चुका था। सूर्य की तरह गोल रेखा वाली उभरती आकृति, स्वस्तिक आदि इस तथ्य के पोषक हैं कि भले ही विष्णु की मूर्ति यहाँ नहीं मिली पर वैष्णव धर्म के प्रतीक यहाँ विद्यमान थे।

  •  धार्मिक मान्यता और विश्वासों का यह युग था। यहाँ शिवलिंग के नीचे गड़े ताबीजों की तरह के पत्थर के टुकड़े मिले हैं। जिसके एक किनारे पर छिद्र बने हैं। सम्भवतः शिव के द्वारा अभिमंत्रित करने के लिए ही ये लिंग के के नीचे गाडे़ गये होंगे। अन्य कुछ ठिक़डो में मानव देवताओं के साथ नृत्य संगीत तथा धार्मिक उत्सवों को मना रहे हैं।

  •   मंत्र-तंत्र में भी इनका विश्वास रहा होगा। मुहरों  पर बने चिन्हों के ऊपर कुछ अपठनीय लिपि में लिखा है। इसे कोई चित्रांकित लिपि कहता है, कोई मात्र रेखा समूह मानता है। पर ये मंत्र रहे होगें। कुछ मुहरों पर तो विचित्र रेखाएं बनाई गई हैं मानो आज के जंत्र-तंत्र हो।

  •  लोक-धर्म का भी यहां चलन था। कुछ मुहरों पर घेरों के भीतर वृक्ष में कुछ में फण निकाले नाग की आकृति आदि लोकजीवन की धार्मिक भावना को व्यक्त करते हैं।
  • मुअनजो-दड़ो की दैव-मार्ग नामक गली मे करीब चालीस फुट लम्बा और पच्चीस फुट चौड़ा प्रसिध्द जल कुंड है, इसकी गहराई सात फुट है। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। कुंड के तीन तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में २ पाँत में ८ स्नानघर है। इस कुंड को काफ़ी समझदारी से बनाया गया है, क्योंकि इसमें किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता।
  • माना जाता है कि यहाँ और भी कई तरह की खेती की जाती थी, केवल कपास को छोडकर यहाँ सभी के बीज मिले है। दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने कपड़ों में से एक का नमूना यहाँ पर ही मिला था। खुदाई मे यहाँ कपडो की रंगाई करने के लिये एक कारखाना भी पाया गया है।
  • यहाँ की सड़कें ग्रिड प्लान की तरह हैं मतलब आड़ी-सीधी हैं। पूरब की बस्तियाँ “रईसों की बस्ती” है, क्योंकि यहाँ बड़े-घर, चौड़ी-सड़कें, और बहुत सारे कुएँ है। मुअनजो-दड़ो की सड़कें इतनी बड़ी हैं, कि यहाँ आसानी से दो बैलगाड़ी निकल सकती हैं। यहाँ पर सड़क के दोनो ओर घर हैं, दिलचस्प बात यह है, कि यहाँ सड़क की ओर केवल सभी घरो की पीठ दिखाई देती है, मतलब दरवाज़े अंदर गलियों में हैं। वास्तव में स्वास्थ्य के प्रति मुअनजो-दड़ो का शहर काबिले-तारीफ़ है, कयोंकि हमसे इतने पिछड़े होने के बावज़ूद यहाँ की जो नगर नियोजन व्यव्स्था है वह कमाल की है।
  •  गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्-भांड, उन पर काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औज़ार। संग्रहालय में काम करने वाले अली नवाज़ के अनुसार यहाँ कुछ सोने के गहने भी हुआ करते थे
  • संग्रहालय में रखी वस्तुओं में कुछ सुइयाँ भी हैं। खुदाई में ताँबे और काँसे की बहुता सारी सुइयाँ मिली थीं।  खुदाई में सुइयों के अलावा हाथीदाँत और ताँबे के सुए भी मिले हैं।
  •  यहाँ  धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर सूक्ष्मता से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से अधिक कला-सिद्ध प्रदर्शित करता है।

 मोहनजो दड़ो आने वाली फिल्म

मोहनजो दड़ो एक आने वाली आगामी भारतीय हिन्दी एपिक एडवेंचर फ़िल्म है। जिसके लेखक तथा निर्देशक आशुतोष गोवारिकर है तथा निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर है तथा सुनीता गोवारिकर है। फ़िल्म में ऋतिक रोशन तथा पूजा हेगड़े मुख्य किरदार है। फ़िल्म का बजट १०० करोड़ है। फ़िल्म १२ अगस्त २०१६ को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी।

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